दोस्तों! हमने अक्सर लोगो को कहते सुना है कि इस दुनिया में हर किसी के लिए कोई न कोई ख़ास हमसफ़र होता है, इस ज़िन्दगी के सफर को पूरा करने के लिए …….

और उस ख़ास हमसफ़र से हमे मिलाने के लिए, ज़िंदगी हर वह दांव खेलती है, जिससे कि वह ज़िंदगी के दोनों हमसफ़र एक दुसरे से मिल सक

दोस्तों हमारी आज की कहानी भी कुछ ऐसे ही दो हमसफ़र की कहानी है जिनको उन्होंने खुद नहीं बल्कि ज़िंदगी ने उनको मिलाया है

 

आज की कहानी है रांची (झारखण्ड) के रहने वाले सुदेश और जम्मू-कश्मीर की रहने वाली रेनू की। … इस कहानी की शुरुआत होती है देश की जानी-मानी यूनिवर्सिटी जेएनयू के एक राजनीतिक बहस कार्यक्रम से। … जहाँ सुदेश अपनी राजनीतिक समझ के चलते इस कार्यक्रम में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका में थे ,और अपने प्रतिवादियों को जमकर जवाब दे रहे थे.

 उसी दौरान जम्मू से अपनी एक दोस्त से मिलने, रेनू जेएनयू आयी हुई थी जहा रेनू ने सुदेश को देखा और उनकी स्पीच की दीवानी हो गयी। डिबेट ख़त्म होने के बाद रेनू ने सुदेश से मुलाक़ात की। और इस पहली नज़र और पहली मुलाक़ात में ही दोनों एक दुसरे के साथ घुल मिल गए और एक अच्छे दोस्त बन गए। उस दौरान सुदेश जेएनयू से इंटरनेशनल पॉलिटिक्स विषय से डॉक्ट्रेट की पढाई कर रहे थे।

 दूसरी तरफ रेनू अपनी जॉब के साथ-साथ जर्नलिज्म कर रही थी। सुदेश को भी जर्नलिज़्म में काफी रूचि थी. इस वजह से उन्होंने भी अपनी डॉक्ट्रेट की पढाई बीच में छोड़, जर्नलिज़्म के कोर्स में एड्मिशन ले लिया। यहाँ दोनों की दोस्ती और गहरा गयी और दोस्ती कब प्यार में बदली पता ही नहीं चला। इसके बाद दोनों ने शादी करने का फैसला लिया और अपने परिजन को इसकी जानकारी देने के बारे में सोचा।

लेकिन सब जानते है हिंदुस्तान में लव मैरिज करना एक जंग जीतने के बराबर है। इनके केस में भी कुछ ऐसा ही हुआ, दोनों ने जैसे ही अपने परिजन को अपने रिश्ते की जानकारी दी, तो शुरूआती बात चित में ही दोनों के विकेट गिरा दिए गए। ऐसे में सुदेश को एक उपाय सूझा कि क्यों न …

अपनी बहन और जीजा से बात की जाए… जोकि पहले से ही रेनू और सुदेश के रिश्ते के बारे में जानते थे।

सुदेश उनके पास गए और उन्होंने अपनी बहन-जीजा से बात-कर समझाया और साथ ही दोनों को रेनू के भाई से मिलने के लिए भी राज़ी कर लिया। इसके बाद सुदेश के जीजा और बहन, रेनू के भाई से मिले और सुदेश- रेनू के रिश्ते को लेकर बात की। जिसके बाद रेनू के भाई सुदेश से मिलने को तैयार हुए.

इसके बाद सुदेश रेनू के भाई से मिले,जब रेनू के भाई उनसे मिले, तो सुदेश से मिलने के बाद उनके व्यक्तित्व से काफी प्रभावित हुए और उन्होंने रिश्ते के लिए हामी भर दी।

लेकिन उनदिनों रेनु के पिता की तबीयत कुछ ठीक नहीं थी इसलिए उनके भाइयो ने उनके ठीक हो जाने के बाद पिताजी को इसकी जानकारी दी।

रेनू के भाइयो की बात सुनने के बाद पिताजी थोड़े नाराज़ हुए, लेकिन काफी समझाने के बाद पिताजी ने सुदेश से मिलने की इच्छा जताई।

इसके बाद सुदेश, रेनू के पिताजी से मिले और जैसा कि उनके भाइयों ने सुदेश के बारे में बताया था वैसा ही पाया। सुदेश से मिलने के बाद रेनू के पिता भी शादी के लिए राज़ी हो गए और इस तरह से सुदेश ने अपना सेमी-फ़ाइनल जीत लिया। लेकिन अभी फ़ाइनल जीतना बाकि था। जोकि इतना आसान नहीं था

अब बारी थी सुदेश के परिजन और पिताजी को मनाने की। सुदेश के पिताजी पहले ही इस रिश्ते पर अपनी नाराज़गी जाहिर कर चुके थे। लेकिन वह ये भी जानते थे कि सुदेश जो फ़ैसला लेते है उसको बदलते नहीं। बावजूद इसके उन्होंने रेनू के रिश्ते के लिए मना करते हुए सुदेश को प्रलोभन दिया, कि “तुम इस लड़की को भूल जाओ मैं, तुमको दहेज़ में गाड़ी, बंगला और बहुत कुछ दिलवा दूंगा”।

लेकिन सुदेश अपने पिताजी की बातो में कहा आने वाले थे। और पिताजी के सारे प्रलोभन को ठुकराते हुए अपनी बात पर बने रहे। वही इसी बीच रेनू के पिता भी सुदेश के घर गए। और उनके पिता से बात की, जिस वजह से सुदेश के पिताजी ने न चाहते हुए रिश्ते के लिए हाँ भर दी। इसके बाद 4.NOV.1994 को दोनों सात जन्मो के बंधन में बंध गए.

शादी के बाद दोनों ने एक नई ज़िंदगी में कदम रखा। जिस वक़्त दोनों की शादी हुई उस वक़्त दोनों अपने-अपने करियर के शुरूआती दौर में थे। रेनू एक नामी अख़बार में काम कर रही थी वही दूसरी तरफ सुदेश भी एक अख़बार में काम कर थे समय अपनी तेज़ी से बीतता गया, एक तरफ जहाँ सुदेश समय-समय पर अपनी जॉब बदलते रहे। वही रेनू को उसी जगह बनी रही।

लेकिन वह कुछ अपना करना चाहती थी इन सबके बीच साल 2004 में रेनू की मुलाक़ात लेखन गिरिजा कुमार से हुई, जिन्होंने अपनी एक किताब का जिक्र रेनू से किया।

इस किताब का नाम ही इतना विवादित था इस वजह से कोई पब्लिकेशन हाउस अपने नाम को ख़राब न होने के डर से पब्लिश नहीं करना चाहता। ऐसे में रेनू ने इस किताब को पब्लिश करने का जिम्मा उठाया और अपनी जॉब छोड़, अपने प्रकाशन की शुरुआत की। जिसका नाम उन्होंने झेलम नदी के नाम पर वितस्ता पब्लिकेशन रखा। इस नाम के पीछे कारण था।

रेनू इस नाम को अपनी बेटी के नाम पर रखना चाहती थी। लेकिन भगवान ने रेनू को दो बेटो से नवाज़ा, बावजूद इसके वह इस नाम को अपनी ज़िन्दगी से जोड़ना चाहती थी। इसके बाद रेनू और लेखक ने इस किताब पर काफी मेहनत कर इसको साल 2006 में प्रिंट किया और जब यह किताब मार्किट में आयी तो इस किताब ने बुक सेलिंग के कई रिकार्डो को तोड़ दिया और विश्वभर में ख्याति हांसिल की।

इस किताब का टाइटल था “ब्रह्मचारी गाँधी एंड हिज वीमेन एसोसिएट्स” इस किताब ने रेनू के पब्लिकेशन हाउस की रूप रेखा बदल कर रख दी। वही दूसरी तरफ सुदेश का जॉब बदलने का सिलसिला ज़ारी रहा।

कभी स्टेटमेन में जनर्लिस्ट के तौर…

कभी मध्यप्रदेश में एक अध्यापक के तौर पर। तो वही कभी ब्रिटिश हाईकमान में राजनीतिक विश्लेषक के तौर पर। लेकिन सुदेश अपनी क्रिएटिव सोच और कुछ नया करने की वजह से समय-समय पर अपनी जॉब बदलते रहे। इस बीच उनको एक इंग्लिश चैनल से जॉब ऑफर हुई।

जोकि उस समय काफी बुरे दौर से गुजर रहा था। लेकिन सुदेश के जॉब ज्वाइन  करने के कुछ हफ्ते बाद ही, वह चैनल टॉप 3 इंग्लिश चैनल में शामिल हो गया। कुछ समय जॉब करने के बाद के बाद सुदेश का दिल वहाँ भी नहीं लगा। उन दिनों देश की राजधानी दिल्ली में भ्र्ष्टाचार के खिलाफ, एक आंदोलन सर उठा रहा था। जिसमे देश दुनिया से लोग अपनी जॉब छोड़ कर इस अभूतपूर्व आंदोलन का हिस्सा बनना चाह रहे थे। सुदेश भी उनमे से एक थे ।

और वह अपनी चैनल की जॉब को बाय-बाय कह आंदोलन में कूद पड़े और आंदोलन से पार्टी बनने तक इस मूवमेंट से जुड़े रहे, ये वक़्त था जब देश भर में लोक सभा के आम चुनाव होने वाले थे। हर तरफ प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार कहे जाने वाले नरेंदर मोदी के चर्चे जोरो पर थे।

इन सब चर्चाओं के बाज़ार में सबसे बड़ा मुद्दा 2002का गोधरा काण्ड (गुजरात) था।

हर कोई इस मुद्दे को, अलग-अलग तरीको से अपने अधूरे ज्ञान के साथ लोगो के सामने परोस रहा था। ऐसे में सुदेश को भी इस मुद्दे से जुडी आधी अधूरी जानकारियाँ थी।

लेकिन कोई भी जानकारी कोई ठोस सबूतों के साथ उपलब्ध नहीं थी जिस वजह से सुदेश ने खुद इस मुद्दे की तह तक जाने का जिम्मा उठाया, उन्होंने इसके बाद अपनी एक टीम बनाई और गोधरा पहुंच, इस मुद्दे की गहनता और बारीक़ जानकारियों को इकठ्ठा कर एक किताब लिखी। जिसका टाइटल था “नरेंद्र मोदी “दा गेम चेंजर” इस किताब में गोधरा काण्ड से जुडी हर एक घटना की सम्पूर्ण जानकारी उपलब्ध थी इस किताब ने देश के प्रधानमंत्री को लेकर हो रही बातो में काफी हद तक लगाम लगाया।

ये किताब साल की सर्वश्रेष्ठ बिकने वाली पुस्तकों में शामिल हो गयी, इस किताब को लिखने के बाद सुदेश का झुकाव देश के प्रधानमंत्री की ओर हो गया और इसके बाद वह पार्टी की अनेक गतिविधियों में शामिल होने लगे, पार्टी ने उनकी काबिलियत देखते हुए, 2015-16 में मीडिया रिलेशन की ज़िम्मेदारी दी। जिसको उन्होने बख़ूबी निभाया और बाद में पार्टी ने सुदेश को पार्टी के प्रवक्ता के तौर पर जिम्मेदारी दी। 

जिसको वह बख़ूबी और जिम्मेदारी से निभा रहे है। सुदेश के इस सफर में उनका साथ उनकी हमसफ़र निभा रही है। सुदेश कहते है कि, जहाँ वह पहुंचे है वहाँ पहुंचने का सारा श्रेय मेरी पत्नी रेनू को जाता है अगर रेनू उनका साथ नहीं देती तो वह यहाँ तक का सफर नहीं तय कर पाते। 

 

वही दूसरी ओर रेनू कहती है, हम दोनों जब से मिले है और आज तक हमारे बीच किसी बात को लेकर असहमति नहीं हुई जिसका नतीजा है कि हम इतना लम्बा सफर तय कर पाए.

कपल मैसेज:

इस खूबसूरत कपल का कहना है कि, “आप चाहे अरेंज मैरिज करे या लव, लेकिन आप को करियर को भी बराबर तवज़्ज़ो देनी चाहिए, क्योंकि जब आप प्यार करते और शादी करना चाहते है तो आपको उससे जुडी जिम्मेदारिओं को भी अच्छे से निभाने के लिए तैयार रहने चाहिए”. प्यार इंसान से करें, न कि रंग-रूप,जाती-धर्म से…

Writer: Manish Mishra 

 

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